Dainik Athah

केन्द्रीय बजट निराशाजनक और गरीब के समझ से परे है: अखिलेश यादव



अथाह ब्यूरो
नयी दिल्ली।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा है कि केन्द्रीय बजट निराशाजनक और गरीब के समझ से परे है। बजट ने किसानों, नौजवानों, व्यापारियों, महिलाओं को निराश किया है। आम जनता के लिए कुछ नहीं है। शिक्षा क्षेत्र की उपेक्षा हुई है। बिना शिक्षा के विकसित भारत कैसे बनेगा। यह बजट सिर्फ सपने दिखाने वाला है।
यादव ने कहा कि भाजपा से आम जनता को कोई उम्मीद नहीं है। इसलिए बजट से भी कोई उम्मीद नहीं है। भाजपा बजट के माध्यम से अपने लोगों को सेट करती है। केवल 5 फीसदी लोगों के लिए बजट लाती है। भाजपा देखती है उनके अपने लोगों का मुनाफा और तरक्की कैसे हो। उन्होंने कहा कि भाजपा ने जो वादे किये थे उन्हें पूरे नहीं किये। किसानों की आय दोगुनी नहीं हुई, मंहगाई बढ़ती जा रही है। नौजवानों के लिए रोजगार नहीं है। भाजपा सामाजिक न्याय के नाम पर गुमराह करती है। सरकार के पास जवाब नहीं है। सरकार को बताना चाहिए कि 95 फीसदी जनसंख्या की प्रति व्यक्ति आय क्या है।
अखिलेश यादव ने कहा कि देश में पर्यावरण की स्थिति भयावह है। दुनिया के सबसे बड़े प्लेटफार्म पर यह सवाल खड़ा हो गया कि देश की हवा ही ठीक नहीं है, जिससे लोगों की जानें जा रही हैं और इन्वेस्टमेंट नहीं आ रहा है। उन्होंने कहा कि अच्छा बजट वो होता है, जिससे गरीब की तरक्की हो, खुशी हो, उनके चेहरे पर मुस्कान आए। लेकिन इस बजट में महंगाई को रोकने के लिए, शिक्षा को बेहतर करने के लिए कोई इंतजाम नहीं। अगर बुनियादी ढांचा नहीं है, तो एआई क्या करेगा? गंदे पानी से लोगों की जान चली गई है, क्या यही इस सरकार की स्मार्ट सिटी है? क्या यही विकसित भारत है?
यादव ने कहा कि जो बुलेट ट्रेन 1 लाख करोड़ की बननी थी वह बुलेट ट्रेन आज 2 लाख करोड़ की बन रही है। बजट बढ़ता जा रहा है।
यादव ने कहा कि 2026 बजट का परिणाम है मार्केट धड़ाम। इस बजट में न आम जनता का जिक्र है न फिक्र। महंगाई बेतहाशा बढ़ने पर भी इस बजट में जनता को टैक्स में छूट न देना, टैक्स-शोषण है। अमीरों के काम-कारोबार और घूमने-फिरने पर दस तरह की छूटें दी गईं हैं लेकिन बेकारी-बेरोजगारी से जूझ रहे लोगों की उम्मीदों की थाली, खाली है। मध्यम वर्ग अपने को ठगा महसूस कर रहा है। शोषित, वंचित, गरीब व्यक्ति जहाँ था उससे भी नीचे जाता दिख रहा है। इस बजट ने उसके चादर में पैबंद लगाने की जगह, उसे और चिथड़ा कर दिया है क्योंकि सामाजिक सुरक्षा शाब्दिक औपचारिकता तक सीमित होकर रह गयी है। किसान, मजदूर, श्रमिक, कारोबारी, छोटा दुकानदार अपने लिए मिली राहत को दूरबीन लेकर भी ढूँढ नहीं पा रहा है।


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