Dainik Athah

फॉगिंग के नाम पर नगर निगम में घोर घपला

जनता का खून ही नहीं नगर निगम का लाखों रुपए महीने का डीजल,पेट्रोल पी रहे मच्छर कागजों में हर रोज दौड़ रही फॉगिंग मशीनें


सोबरन सिंह
गाजियाबाद।
भ्रष्टाचार के मामले में नगर निगम ने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण को भी पीछे धकेल दिया है। निगम में बैठे जिम्मेदार अधिकारियों ने सूबे के सीएम की भ्रष्टाचार जीरो टॉलरेंस मुहिम को बड़ी बेशर्मी से खूंटी पर टांग दिया है। डस्टबिन खरीद में हुए करोड़ों के घोटाले का जिन्न अभी शांत भी नहीं हुआ था कि कूड़ा उठान में करोड़ों के वारे न्यारे करने के मामले में खूब हो हल्ला हो रहा, लेकिन ताज्जुब है कि भ्रष्टाचार में किए जा रहे करोड़ों के खेल में किसी भी निगम अधिकारी की जुबान नहीं खुली और ना ही किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई। बस मामला जांच के नाम पर लटका दिया जाता है। इससे लगता है कि सब के सब हमाम में नंगे नहाए हुए हैं। अब घोटाले का एक और जिन्न निगम की बोतल के बाहर आकर गुर्रा रहा है।


विश्वस्त सूत्रों की माने तो नगर निगम के नगर स्वास्थ्य अधिकारी की देखरेख में महानगर के पांचों जोन में फॉगिंग के नाम पर डीजल, पेट्रोल की कालाबाजारी की जा रही है। बताते हैं कि निगम के पांचों जोन में फागिंग का कार्य धड़ल्ले से चलाया जा रहा है लेकिन दिखाई कहीं नहीं दे रहा है,दिखाई देगा भी नहीं, क्योंकि फागिंग की मशीनें केवल कागजों में फर्राटे भर रही है। बताते है कि पूर्व में फॉगिंग का कार्य 1-2 बार ही होता था । लेकिन जब से निगम में नगर स्वास्थ्य अधिकारी का पद सृजित हुआ है और इसकी जिम्मेदारी डॉ मिथिलेश को मिली है। तब से मच्छर मारने व भगाने के लिए निगम के पांचों जोनों में फागिंग का काम हर रोज किया जा रहा है। सूत्रों की माने तो फॉगिंग के नाम पर प्रतिदिन करीब 1000 लीटर डीजल और करीब 125 लीटर पेट्रोल खर्च किया जा रहा है। मतलब नगर निगम के 5 ज़ोन में फॉगिंग के नाम पर करीब एक लाख रुपए के डीजल पेट्रोल का प्रतिदिन बंदरबांट किया जा रहा है। फॉगिंग की आड़ में कमीशन खोरी के डीजल पेट्रोल का एक साल में करोड़ों रुपए की काली कमाई की जा रही है जिसे देखने वाला कोई नहीं है।
सूत्र बताते हैं कि ज़ोन में 180 से लेकर 200 लीटर डीजल और करीब 25 लीटर पेट्रोल का खर्च मच्छर मारने के लिए फॉगिंग के नाम पर प्रतिदिन किया जा रहा है। जबकि महानगर के किसी भी वार्ड में महीने 2 महीने में कभी कभार बाइक से इक्का-दुक्का जगह धुंआ छोड़ा जाता है, जबकि स्वास्थ्य विभाग के खाते में फॉगिंग प्रतिदिन दर्शाई जा रही है। कहने का मतलब है कि मच्छर जनता के खून के साथ साथ हर माह नगर निगम का लाखों रुपए कीमत का डीजल, पेट्रोल भी चूस रहे हैं।
मान लिया जाए कि 1000 लीटर डीजल की कीमत 89 रुपए के हिसाब से 89 हजार हुई और 125 लीटर पेट्रोल की कीमत 12 हजार होती है जो एक दिन में करीब एक लाख एक हजार रुपए और एक महीने के 25 दिन में 25 लाख, 25 हजार और इसी हिसाब से साल भर में तीन करोड़ तीन लाख होती है। कुल मिलाकर मच्छर मारने के नाम पर नगर निगम में करोड़ों रुपए का सीधा घोटाला किया जा रहा है। सूत्र बताते है कि मच्छर मारने वाली दवा तो आती है पर इस्तेमाल नहीं की जाती है। सवाल है कि मच्छर मारने की दवा का भुगतान किया जाता है पर दवा जाती कहां है। सूत्र बताते हैं एक सोची समझी कूटिनीति के चलते दवा की जगह डीजल
का धुंआ उड़ाया जाता हैं वह भी महीने में कभी कभार, लेकिन निगम के बही खाते में प्रतिदिन मच्छर मारने के नाम पर मोटा गेम खेलकर सम्बंधित अधिकारी अपनी जेब भरकर निगम को चूना लगा रहे हैं।

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