2 मार्च को होगा होलिका पूजन
जानिए होलिका पूजन के शुभ मुहूर्त और विधि
3 मार्च को ग्रहण के समापन के बाद भी कुछ उपाय विशेष के बाद होलिका दहन कर सकते हैं
4 मार्च को खेला जाएगा रंग

शिव शंकर ज्योतिष एवं वास्तु अनुसंधान केंद्र
गाजियाबाद। पंडित शिवकुमार शर्मा के अनुसार इस वर्ष होलिका पर्व तीन दिन का होगा जो दो, तीन और चार मार्च को मनाया जाएगा। होलिका पूजन के लिए महिलाएं अपने संतानों की स्वास्थ्य एवं लंबी आयु की कामना से और होलिका मां का आशीर्वाद लेने के लिए होली का पूजन करती हैं ।स्थान स्थान पर लकड़ी उपले आदि से बनाई हुई होलिका के पास जाकर विधि विधान से पूजा करती हैं और होलिका मां को विशिष्ट पूजन सामग्रियों से पूजा करती हैं।
होली पूजन के शुभ लग्न मुहूर्त
2 मार्च दिन सोमवार को सौम्य योग में 12:20 बजे से 14:34 बजे तक होलिका पूजन के लिए मिथुन लग्न में अति शुभ मुहूर्त है।इसके उपरांत 14:34 बजे से 16:54 बजे तक (चर लग्न) कर्क लग्न है । यह समय भी होलिका पूजन का अच्छा मुहूर्त है। शाम को 5:55 से पूर्णिमा आ जाएगी उसे समय सिंह लग्न व्याप्त रहेगा। यह भी पूजन के लिए उत्तम समय है। क्योंकि पूर्णिया तिथि आरंभ होते ही भद्रा आरंभ हो जाएगी। भद्रा में केवल होलिका दहन करना शुभ नहीं होता है।होली का पूजन कर सकते हैं।
होलिका पूजन की पूजन की विधि
महिलाएं अपने घर से गोबर के बने हुए बरकुले,कच्चा सूत और पूजन सामग्री लेकर जाएं। सबसे पहले होली का पर कच्चा सूत लपेटें।अपने-अपने लोकाचार के अनुसार रोली, अक्षत, जल, गुड़, मूंग, हल्दी चढ़ाएँ।होलिका की तीन या पांच परिक्रमा करें। परिक्रमा सीधे हाथ की ओर से करें। अपनी संतान की आयु व आरोग्य के लिए प्रार्थना करें। 2 मार्च को शाम को 5:55 से 3 मार्च प्रातः काल 5:31 बजे तक भद्रा रहेगी, इसलिए इस अवधि में होलिका दहन नहीं होगा।और 3 मार्च को प्रातः 6: 20 बजे से चंद्र ग्रहण का सूतक आरंभ हो जाएगा। यद्यपि शास्त्रों में प्रातः काल होलिका दहन नहीं करने का आदेश है। क्योंकि होलिका दहन पूर्णिमा युक्त प्रदोष काल में ही हो सकता है। लेकिन प्रतीकात्मक रूप में आप प्रातः 5:31 बजे से 6: 20 बजे तक होलिका दहन कर सकते हैं।क्योंकि 3 मार्च को पूरे दिन सूतक और चंद्र ग्रहण का प्रभाव रहेगा। इसीलिए न तो होली का पूजन होगा और न ही होलिका दहन होगा। 3 मार्च को शाम 6: 47 बजे पर चंद्र ग्रहण खत्म हो जाएगा। लेकिन पूर्णिमा तिथि भी नहीं रहेगी। इसलिए उस दिन भी होलिका दहन नहीं कर सकेंगे। 4 मार्च को प्रातः काल से ही चैत्र कृष्ण प्रतिपदा है। प्रतिपदा में ही रंग खेलने का विधान है।इसलिए दुल्हैण्डी 4 मार्च को ही मनाई जाएगी। अर्थात रंग खेला जाएगा ।

3 मार्च को ग्रहण के पश्चात उपाय करने के बाद होलिका दहन कर सकते हैं..
कुछ विद्वान 3 मार्च को ग्रहण के बाद प्रतिपदा तिथि में होलिका दहन करवा रहे हैं। वह शास्त्रों के अनुकूल तो नहीं है लेकिन भद्रा , सूतक ग्रहण के चलते अति आवश्यक होने से कुछ उपायों के साथ 3 मार्च की शाम को 6:50 बजे से 9:00 बजे तक होलिका दहन कर सकते हैं।शास्त्रों में तो कहा गया है-होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा का अनुष्ठान है, प्रतिपदा का नहीं।निर्णय सिंधु में स्पष्ट उल्लेख है —फाल्गुने पौर्णमास्यां प्रदोषव्यापिन्यां होलिका दाहः। अर्थात् फाल्गुन पूर्णिमा जो प्रदोष काल में व्याप्त हो, उसी में दहन करना चाहिए।इसी प्रकार धर्मसिन्धु में भी पूर्णिमा-व्याप्ति को अनिवार्य बताया गया है। प्रतिपदा में दहन करने के कुछ दुष्परिणाम बताए गए हैं।पर्व संबंधी फल अपेक्षित रूप से प्राप्त नहीं होता है। क्षेत्र विशेष में अशांति या विघ्न की आशंका हो सकती है। क्योंकि होलिका दहन संतति-रक्षा से जुड़ा पर्व है। संतान पक्ष को परेशानी उत्पन्न सकती है।धर्मशास्त्रीय सिद्धान्त तो यह है, तिथिहीनं न कर्तव्यं अग्नि कर्म तिथि से रहित अग्नि संबंधी कर्म नहीं करना चाहिए।यदि भूलवश अथवा अन्य कारणों से प्रतिपदा में होलिका दहन करना पड़े तो प्रायश्चित्त स्वरूप भगवान विष्णु,नृसिंह की पूजा,अग्नि देव से क्षमा प्रार्थना करनी चाहिए।गौ, ब्राह्मण, बालक को यथोचित वस्तुएं दान करने से दोष शान्त हो जाता है।पंडित शिवकुमार शर्मा, ज्योतिषाचार्य एवं वास्तु कंसलटेंट गाजियाबाद
