Dainik Athah

ब्यूरोक्रेट्स की नजरें जमी है प्रदेश में बनने वाली संभावित सरकार पर

– उप्र विधानसभा चुनाव के छठे चरण का प्रचार समाप्त होने के साथ ही

– कुछ ब्यूरोक्रेट्स ने संभावित सरकार को लेकर बनानी शुरू की रणनीति

– पूरे दिन एक से दूसरे स्थान पर व्हाट्सप कालिंग पर बात कर बैठा रहे गणित

अशोक ओझा
लखनऊ।
उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए पांच चरणों का चुनाव समाप्त होने के साथ ही ब्यूरोक्रेसी की निगाह दस मार्च के बनने वाली संभावित सरकार पर लग गई है। इस समय यदि किसी में सबसे अधिक बेचैनी देखी जा रही है तो वह प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी है। इन आईएएस- आईपीएस, पीसीएस- पीपीएस अधिकारियों का दिन का आधा समय चुनावी चर्चा में ही बीत रहा है।

उत्तर प्रदेश में पांच चरण का चुनाव हो चुका है। छठे चरण के मतदान के लिए चुनाव प्रचार मंगलवार को थम गया। अब कुल दो चरण का मतदान शेष है। एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी का कहना है कि पांच चरण में स्थिति बहुत कुछ स्पष्ट हो जाती है कि सरकार किसकी बन रही है। हालांकि इस बार का चुनाव ऐसा है कि स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट नजर नहीं आ रही है। जिस अधिकारी के दिल में यदि कोई दल अथवा नेता बसता है तो उसे उसी दल की सरकार बनती नजर आ रही है। यहीं कारण है कि व्हाटसअप कॉल के जरिये अधिकारियों के बीच इन दिनों खिचड़ी पक रही है।

व्हाट्सअप कॉल का लाभ यह है कि इसकी रिकार्डिंग की प्रक्रिया थोड़ी जटिल है। मोबाइल कॉल करने से अधिकारी इसलिए हिचकते हैं कि अधिकांश लोगों ने अपने मोबाइल का कॉल रिकार्डर चालू किया हुआ है। जब भी कोई कॉल आयेगी स्वत: ही रिकार्ड हो जायेगी।
वर्तमान स्थिति पर गौर करें तो भाजपा समर्थक अफसरों को उम्मीद है कि सीटें कम होने के बावजूद सरकार बाबा की ही बनेगी। जबकि सपा समर्थक अधिकारियों को गठबंधन की सरकार बनती नजर आ रही है। करीब एक दर्जन से अधिक अधिकारियों से बात के बाद निचोड़ यहीं निकलता है कि कोई भी अधिकारी यह बात दावे के साथ नहीं कह सकता कि सरकार किस दल की बन रही है। सपा समर्थक एक वरिष्ठ अधिकारी की बात लें तो वे दबी जुबान में कहते हैं कि 180 सीटें भी यदि भाजपा की आती है तो वह खुद सरकार बनायेगी। विरोधियों की सरकार वह बनने नहीं देगी।

इस पूरे घटनाक्रम में एक पुलिस अफसर ही ऐसे नजर आये जिनका मानना है कि गठबंधन 225 से ज्यादा सीटें जीतकर सरकार बनायेगा। किस दल को कितनी सीटें मिल रही है इसके लिए कुछ अधिकारी तो वरिष्ठ पत्रकारों एवं राजधानी (दिल्ली- लखनऊ) में बैठे हुए जिनसे उनके घनिष्ट संबंध है से भी इसी विषय में चर्चा कर रहे हैं। एक खुफिया विभाग से जुड़े मित्र बताते हैं कि पूरे दिन में कम से कम दस फोन वरिष्ठ अधिकारियों के होते हैं जो चुनावी गुणा- भाग करते हैं।

इस बेचैनी का मुख्य कारण यह है कि सरकार किस तरफ जा रही है उसे देखकर वे भी अपना रास्ता तय करें। हालांकि एक वरिष्ठ ब्यूरोक्रेट मित्र कहते हैं ब्यूरोक्रेसी तो राजपूत है, अर्थात जिसका राज उसका पूत। मतलब समझ गये। हालांकि पहले से अनुमान लगने पर अपना जुगाड़ बैठा लिया जाता है। जैसे जैसे मतगणना के दिन नजदीक आते जायेंगे वैसे वैसे ही ब्यूरोक्रेसी की बेचैनी भी बढ़ती जायेगी।

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