Dainik Athah

एजुकेशन कॉन्क्लेव 2026 में छाया रहा शिक्षा का ‘योगी मॉडल’, यूपी की शिक्षा नीति बनी चर्चा का केंद्र

अपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा ने रखा उत्तर प्रदेश का पक्ष, कहा- स्पष्ट लक्ष्य और मजबूत क्रियान्वयन से मिले परिणाम’

विभिन्न राज्यों के शिक्षा विशेषज्ञों, नीति निमार्ताओं और प्रशासकों के बीच उत्तर प्रदेश का मॉडल को लेकर विमर्श

स्पष्ट लक्ष्य, सतत मूल्यांकन और सशक्त शिक्षक बने बदलाव की आधारशिला

मूल्यांकन को दंड नहीं, सुधार का माध्यम बनाने पर जोर दे रही योगी सरकार


अथाह ब्यूरो
लखनऊ।
देश में शिक्षा सुधार को लेकर आयोजित एजुकेशन कॉन्क्लेव 2026 में उत्तर प्रदेश का ‘योगी मॉडल’ प्रमुख रूप से उभरकर सामने आया। सेंट्रल स्क्वेयर फाउंडेशन (सीएसएफ) द्वारा आयोजित इस राष्ट्रीय मंच पर बेसिक एवं माध्यमिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था में हुए बदलावों को रेखांकित किया। कार्यक्रम में मौजूद विभिन्न राज्यों के नीति-निमार्ताओं, विशेषज्ञों और प्रशासकों के बीच उत्तर प्रदेश का मॉडल चर्चा का केंद्र रहा।
कॉन्क्लेव में मूल्यांकन प्रणाली को भी सुधार के दृष्टिकोण से विकसित परख, आधारभूत साक्षरता एवं संख्यात्मकता (एफएनएल), प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा (ईसीई), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और एडटेक के उपयोग जैसे विषयों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। ह्यनिपुण भारत मिशनह्ण के अंतर्गत राज्यों के अनुभवों और सफल मॉडलों को साझा किया गया।
इस दौरान एसीएस शर्मा ने बताया कि उत्तर प्रदेश में शिक्षा सुधार को स्पष्ट लक्ष्य, सतत मूल्यांकन और सशक्त शिक्षक के आधार पर आगे बढ़ाया गया है। राज्य में ‘लक्ष्य’ आधारित शिक्षण, निरंतर आकलन और शिक्षक-केंद्रित दृष्टिकोण ने शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा दी है। योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करते हुए उन्हें जमीन पर परिणाम में बदला गया है, जिससे शिक्षा व्यवस्था में गुणात्मक सुधार देखने को मिला है।
उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षकों को सहयोग देने और उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने पर प्रदेश सरकार ने विशेष जोर दिया है। एआरपी (अकादमिक रिसोर्स पर्सन) जैसे मेंटर कैडर, संकुल बैठकों के माध्यम से संवाद और ह्यतालिकाह्ण के जरिए छात्रों की प्रगति की नियमित निगरानी ने सिस्टम को अधिक जवाबदेह और परिणाममुखी बनाया है।
मूल्यांकन प्रणाली को सुधारात्मक दृष्टिकोण के साथ विकसित करते हुए इसे पुरस्कार या दंड के बजाय अधिगम की कमियों की पहचान और उनके समाधान के प्रभावी उपकरण के रूप में उपयोग किया जा रहा है, जिससे वास्तविक सीखने के परिणामों पर फोकस बढ़ा है। निपुणता हासिल करने में जिन विद्यालयों को कठिनाइयां आ रही हैं, उन्हें निरंतर मार्गदर्शन और सहयोग प्रदान किया जा रहा है, जबकि तकनीक के प्रभावी उपयोग से प्रशासन और शिक्षक के बीच रियल-टाइम कनेक्टिविटी स्थापित होकर त्वरित निर्णय और प्रभावी क्रियान्वयन संभव हुआ है, जो शिक्षा प्रणाली की एक बड़ी ताकत बनकर उभरा है; साथ ही रणनीति को केवल ‘निपुण विद्यालयों’ की मान्यता तक सीमित न रखते हुए उन सफल प्रक्रियाओं और प्रथाओं की पहचान कर पूरे राज्य में लागू करने पर जोर दिया जा रहा है, जिससे मॉडल के विस्तार और संस्थागत मजबूती को गति मिल रही है।


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