जिस जमीन पर कॉलेज चलने का दावा, वहां घरेलू टैक्स का बिल;
दूसरी ओर खसरा 566 की खाली भूमि पर लाखों का कमर्शियल बिल
—नगर निगम के संपत्ति कर विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल

गाजियाबाद। सिहानी सद्दीक नगर स्थित पंडित तेजराम कॉलेज ऑफ एजुकेशन की भूमि, भवन और मान्यता से जुड़े सवालों का विवाद अभी शांत भी नहीं हुआ था कि नगर निगम के संपत्ति कर विभाग, सिटी जोन से जारी गृहकर के दस्तावेजों ने पूरे मामले को और पेचीदा बना दिया है। उपलब्ध कर दस्तावेजों में भवन संख्या, करदाता के नाम, संपत्ति की प्रकृति और जारी किए गए कर बिलों में ऐसा अंतर दिखाई देता है, जो पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करता है।
मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि एक तरफ कॉलेज के नाम से कमर्शियल श्रेणी में लाखों रुपये का गृहकर बिल जारी होने की जानकारी सामने आती है, वहीं दूसरी ओर उसी प्रकरण से जुड़ी संपत्ति पर घरेलू/रेजिडेंशियल श्रेणी में बिल जारी किया गया है। सवाल यह है कि आखिर नगर निगम के रिकॉर्ड में संबंधित संपत्ति की वास्तविक स्थिति क्या है?
31 जनवरी 2024 को भवन संख्या 505 पर घरेलू बिल
दस्तावेजों के अनुसार नगर निगम के संपत्ति कर विभाग, सिटी जोन की ओर से 31 जनवरी 2024 को सीसी संख्या 21306 के तहत भवन संख्या 505 के लिए 31 मार्च 2024 तक के बकाये का करीब 3.20 लाख रुपये का रेजिडेंशियल/घरेलू गृहकर बिल जारी किया गया।

यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस परिसर को कॉलेज के संचालन से जोड़कर देखा जा रहा है, वहां संपत्ति कर विभाग ने उसे घरेलू श्रेणी में किस आधार पर दर्ज किया? यदि वहां शैक्षणिक गतिविधियां संचालित हो रही थीं तो कर निर्धारण की श्रेणी क्या होनी चाहिए थी और उसके लिए निगम के पास कौन से दस्तावेज मौजूद थे?
मामला यहीं खत्म नहीं होता। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक 28 मई 2025 को इसी भवन संख्या 505 से संबंधित करीब 1,29,104.74 रुपये का घरेलू बिल जारी किया गया। बिल कॉलेज के नाम से नहीं बल्कि चमन शर्मा के नाम से भेजे जाने की बात सामने आ रही है।
यानी सवाल केवल टैक्स की रकम का नहीं, बल्कि करदाता की संपत्ति की वास्तविक पहचान का भी है।
यदि भवन में कॉलेज संचालित हो रहा था तो घरेलू श्रेणी का बिल किसी व्यक्ति विशेष के नाम पर क्यों? और यदि संपत्ति निजी आवासीय थी तो कॉलेज का संचालन वहां किस आधार पर हो रहा ? इन दोनों परिस्थितियों में नगर निगम के रिकॉर्ड की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
भवन संख्या 566 पर कॉलेज के नाम से लाखों का कमर्शियल बिल
दूसरी ओर, उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार 16 मई 2025 को कर अधीक्षक, सिटी जोन की ओर से सीसी संख्या 106085 के तहत भवन संख्या 566 पर पंडित तेजराम कॉलेज ऑफ एजुकेशन के नाम से करीब 2,23,133.40 रुपये का कमर्शियल गृहकर बिल जारी किया गया।
एक तरफ भवन संख्या 505 पर घरेलू श्रेणी में लाखों रुपये का बिल, जबकि दूसरी तरफ भवन संख्या 560-566 पर कॉलेज के नाम से कमर्शियल श्रेणी का बिल। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि नगर निगम के संपत्ति कर रिकॉर्ड में आखिर कॉलेज की वास्तविक संपत्ति कौन सी है?

खाली कृषि भूमि पर टैक्स या कॉलेज की जमीन पर घरेलू बिल?
इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू संपत्ति की भौतिक स्थिति को लेकर बताया जा रहा है। आरोप है कि जिस भूमि से कॉलेज की संपत्ति को जोड़कर नगर निगम का टैक्स रिकॉर्ड तैयार किया गया, उसका एक हिस्सा मौके पर कृषि भूमि/खाली जमीन के रूप में मौजूद है।
यदि वास्तव में जमीन खाली है तो वहां भवन संख्या किस आधार पर दर्ज हुई? उसका कर निर्धारण किस आधार पर किया गया? और यदि भवन मौजूद है तथा उसमें कॉलेज संचालित हो रहा है तो उसका रेजिडेंशियल टैक्स निर्धारण क्यों?
यही वे सवाल हैं जिनका जवाब अब नगर निगम के संपत्ति कर विभाग को दस्तावेजों के साथ देना चाहिए।
कितना टैक्स जमा हुआ, यह भी जांच का विषय
31 जनवरी 2024 के बिल से लेकर मई 2025 तक जारी हुए अलग-अलग बिलों में कर की रकम और श्रेणी सामने आने के बाद अब यह भी जांच का विषय है कि इन बिलों के आधार पर वास्तव में कितनी धनराशि जमा हुई और किस खाते में जमा हुई। क्या पुराने बिल संशोधित हुए?
क्या संपत्ति की श्रेणी बदली गई? क्या नाम में कोई संशोधन हुआ? क्या मौके का निरीक्षण किया गया?
किस अधिकारी ने कर निर्धारण किया? और क्या कॉलेज संचालन से संबंधित दस्तावेजों को देखकर कर निर्धारण किया गया?
पंडित तेजराम कॉलेज से जुड़े भूमि और भवन संबंधी दस्तावेजों पर पहले से सवाल उठाए जाते रहे हैं। अब संपत्ति कर विभाग के अलग-अलग भवन नंबरों और कर श्रेणियों ने मामले को और गंभीर बना दिया है।
यदि एक ही संस्थान से संबंधित संपत्ति के लिए अलग-अलग भवन संख्या, अलग-अलग करदाता और अलग-अलग कर श्रेणियां दर्ज हैं, तो इसकी फाइल-स्तर से लेकर मौके तक जांच जरूरी है।
यह जांच केवल कॉलेज प्रबंधन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। नगर निगम के संपत्ति कर विभाग के उन अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए जिन्होंने संबंधित संपत्तियों का निरीक्षण, कर निर्धारण, नामांकन और बिल जारी किया।
‘खेल’ है या रिकॉर्ड की गलती—जांच से खुलेगा राज
इस पूरे मामले में फिलहाल किसी अधिकारी या कॉलेज संचालक पर अनियमितता का अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों में दिखाई दे रहे नाम, भवन संख्या, संपत्ति की प्रकृति और टैक्स श्रेणी के अंतर इतने गंभीर हैं कि इन्हें महज तकनीकी त्रुटि कहकर नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।
नगर निगम को चाहिए कि वह भवन संख्या 505 और 566 से संबंधित पूरी कर फाइल सार्वजनिक जांच के लिए उपलब्ध कराए और यह स्पष्ट करे कि किस आधार पर कौन सा बिल जारी किया गया।
साथ ही मौके का भौतिक सत्यापन कराकर यह भी बताया जाना चाहिए कि कहां वास्तविक भवन है, कहां खाली जमीन है और किस संपत्ति पर वास्तव में कॉलेज का संचालन हो रहा है।
पंडित तेजराम कॉलेज की भूमि और भवन से जुड़े सवालों के बीच सामने आए ये गृहकर बिल एक बड़े सवाल की ओर इशारा कर रहे हैं—क्या नगर निगम के संपत्ति कर रिकॉर्ड में भी संपत्ति की वास्तविक स्थिति और कागजी स्थिति के बीच कोई अंतर है?
अगर सब कुछ नियमानुसार है तो नगर निगम के रिकॉर्ड और मौके की स्थिति आसानी से स्पष्ट हो सकती है। लेकिन यदि दस्तावेजों और मौके में अंतर मिलता है तो यह केवल टैक्स निर्धारण की गलती नहीं, बल्कि राजस्व नुकसान और कथित मिलीभगत की संभावनाओं की गंभीर जांच का मामला बन सकता है।
