हाथरस जिलाधिकारी अतुल वत्स ने गणतंत्र दिवस पर संबोधन में बताया कलेक्ट्रेट का अर्थ
कलेक्ट्रेट नागरिकों के लिए भय का नहीं, बल्कि भरोसे का प्रतीक बनना चाहिए
हर व्यक्ति को यह महसूस हो कि यह उसका अपना प्रशासन है, उसकी अपनी सरकार है
अशोक ओझा
गाजियाबाद/ हाथरस। कलेक्ट्रेट वह स्थान है जहां पर पूरे जिले के लोग एक विश्वास के साथ जाते हैं कि यहां पर उनकी समस्याओं समाधान होगा। लेकिन कितने लोग है जो कलेक्ट्रेट का अर्थ सही मायने में जानते हैं अथवा लोगों के भरोसे के अनुसार काम कर उन्हें राहत पहुंचाते हैं। यदि कुछ आईएएस अधिकारियों की भाषा में जैसा मैंने कुछ वर्ष पूर्व कई आईएएस से सुना ‘कलेक्ट्रेट का अर्थ कलेक्ट करना होता है। हालांकि उनमें से एक ने बाद में कहा कलेक्ट का अर्थ राजस्व से होता है’।
आज हाथरस जिलाधिकारी अथवा कलेक्टर अतुल वत्स द्वारा गणतंत्र दिवस पर किया संबोधन आपके समक्ष हूबहू प्रस्तुत कर रहा हूं जिससे आप लोगों को भी समझ में आयेगा कि कलेक्ट्रेट का असली अर्थ क्या होता है। यह संबोधन मेरे दिल को छू गया इसीलिए इसे आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं।
आज गणतंत्र दिवस के इस पावन अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाई। यह सौभाग्य है मेरा कि मुझे आज आप सभी को संबोधित करने का अवसर मिला है। यहाँ उपस्थित सभी भारतीयों, विशेषकर स्वंत्रता संग्राम सेनानी के परिवारजनों और सेवानिवृत सैनिकों को भी विशेष रूप से नमन।
आज मैं आपको कलेक्ट्रेट के विषयक बताता हूँ। यहाँ पर मैं केवल एक प्रशासनिक भवन की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं उस स्थान की चर्चा कर रहा हूँ, जहाँ जनपद का सामान्य नागरिक अपनी आशा, अपनी पीड़ा और अपने विश्वास के साथ आता है—हमारा कलेक्ट्रेट।
कलेक्ट्रेट केवल ईंट-पत्थर की एक इमारत नहीं है। यह शासन और जनता के बीच सेतु है। यह वह केंद्र है जहाँ से जिले के प्रशासनिक, राजस्व तथा कानून-व्यवस्था से जुड़े कार्य संचालित होते हैं। ऐतिहासिक रूप से यह संस्था अठारहवीं शताब्दी से चली आ रही है और स्वतंत्र भारत में इसकी भूमिका और भी व्यापक हुई है—आज यह विकास योजनाओं, चुनाव प्रक्रिया, आपदा प्रबंधन और जन-कल्याणकारी कार्यों का प्रमुख आधार बन चुकी है।
मैं आप सभी से यह कहना चाहता हूँ कि कलेक्ट्रेट को मैं केवल एक कार्यालय नहीं, बल्कि एक परिवार मानता हूँ। यहाँ कार्य करने वाला प्रत्येक अधिकारी-कर्मचारी इस परिवार का सदस्य है और हमारा सामूहिक दायित्व है कि जो भी नागरिक यहाँ आए, उसे सम्मान, संवेदनशीलता और अपनत्व का अनुभव हो।
मैं अक्सर सोचता हूँ—जब अंग्रेजी शासन के समय कोई हिंदुस्तानी इस भवन में आता होगा, तो उसके मन में कैसी भावना होती होगी? संभवत: भय, संकोच और हीनता का भाव। शायद वह स्वयं को छोटा और असहाय महसूस करता होगा। वह दौर ऐसा था, जब सत्ता से दूरी थी और आम नागरिक प्रशासनिक भवनों को डर के प्रतीक के रूप में देखता था।
आज हम स्वतंत्र भारत के सेवक हैं। आज वही कलेक्ट्रेट नागरिकों के लिए भय का नहीं, बल्कि भरोसे का प्रतीक बनना चाहिए। यदि कोई प्रार्थी या फरियादी इस परिसर में आए, तो उसे हमारे व्यवहार से यह अनुभूति होनी चाहिए कि यहाँ उसके अपने लोग बैठे हैं—कोई विदेशी शासक नहीं। उसे यह लगे कि उसकी बात सुनी जाएगी, उसकी पीड़ा को समझा जाएगा और समाधान के लिए ईमानदारी से प्रयास किया जाएगा।
मैं चाहता हूँ कि जब कोई व्यक्ति हमारे कलेक्ट्रेट से बाहर जाए, तो वह बद-दुआ लेकर नहीं, बल्कि आशीर्वाद देकर जाए। यही लोकतंत्र की असली पहचान है—जहाँ प्रशासन शक्ति के प्रदर्शन से नहीं, बल्कि सेवा और संवेदना से चलता है। हम सब पर यह नैतिक दायित्व है कि हम इस ऐतिहासिक संस्था की गरिमा को केवल संरक्षित ही न रखें, बल्कि उसे और अधिक मानवीय, पारदर्शी और नागरिक-केन्द्रित बनाएं। हमारा व्यवहार, हमारी भाषा और हमारी कार्यशैली यह तय करेगी कि जनता हमें किस रूप में देखती है।
आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि कलेक्ट्रेट ऐसा स्थान बने जहाँ लोग भय के साथ नहीं, विश्वास के साथ आएँ—जहाँ हर व्यक्ति को यह महसूस हो कि यह उसका अपना प्रशासन है, उसकी अपनी सरकार है।
